मनात अस्वस्थता घेऊन चालत जाशील तर (भावानुवाद)
आश्विन जावडेकर (अजब)
मूळ कविता (जावेद अख्तर):
दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम
नज़र में ख्वाबों की बिजलियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम
हवा के झोकों के जैसे आज़ाद रहना सीखो
तुम एक दरियाँ के जैसे लहरों में बहना सीखो
हर एक लम्हें से तुम मिलो खोले अपनी बाहें
हर एक पल एक नया समा देखे यह निगाहें
जो अपनी आँखों में हैरानियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम
दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम....
(जावेद अख्तर)
नज़र में ख्वाबों की बिजलियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम
हवा के झोकों के जैसे आज़ाद रहना सीखो
तुम एक दरियाँ के जैसे लहरों में बहना सीखो
हर एक लम्हें से तुम मिलो खोले अपनी बाहें
हर एक पल एक नया समा देखे यह निगाहें
जो अपनी आँखों में हैरानियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम
दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो, तो ज़िंदा हो तुम....
(जावेद अख्तर)
भावानुवाद:
मनात अस्वस्थता घेऊन चालत जाशील तर तू जिवंत आहेस...
डोळ्यांत स्वप्न विजेवत चकाकत ठेवशील तर तू जिवंत आहेस...
वाऱ्याच्या झोक्यागत मुक्त राहायला शीक
पाण्याच्या लाटांगत मुक्त वाहायला शीक
प्रत्येक क्षणाला भेट बाहू पसरून
प्रत्येक क्षण येतोय नवी बहार घेऊन ...
स्वत:च्या नजरेत बेचैनी आणून चालशील तर तू जिवंत आहेस...
मनात अस्वस्थता घेऊन चालत जाशील तर तू जिवंत आहेस...
- आश्विन जावडेकर ('अजब'), मॅंचेस्टर, यु. के.
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